Thursday, November 20, 2014

काशी क्यों बने केन्द्रशासित प्रदेश ?


एक विशिष्टता है वाराणसी की। यह विशिष्टता किसी पहचान की मुहताज नही है। यह हम देश के नागरिकों का दायित्व है कि इसे स्वीकार करें। अनादिकाल से एक मूल संस्कृति चली आती है। काशी ने उस सांस्कृतिक प्रवाह में अहम भूमिका अदा की है। उस समय विश्व में कोई और धर्म नहीं था। सभ्यता की उजास कहीं-कहीं दिखनी प्रारम्भ हुई थी। तब की दुनिया में सिर्फ एक सर्वशक्तिमान ईश्वर हुआ करता था। वेदों के बाद के काल में काशी धर्म संस्कृति का मुख्य पड़ाव बना। काशी अलग है। इसीलिये कहा गया कि यह नगरी शिव के त्रिशूल पर बसी है। सिर्फ बनारसी साड़ी, काशी की पहचान नहीं है। इसमें भदोही की कालीन और देवकीनंदन खत्री की चंद्रकांता संतति की भावभूमि आज का चंदौली भी आता है। पयर्टन विकास की यहाॅ असीम संभावनाएॅ है। कल्पना करें कि काशी सारनाथ सड़क मार्ग से कम्बोडिया, बैंकाक से जुड़ गया है। अब सोचे कि बुद्विस्ट यात्रियों की संख्या में कितनी अभिवृद्धि होगी ? विकास के अनेक आयाम अभी सोचे भी नही गये है। 

शूलटंकेश्वर से गंगा अगर उत्तरमुखी होती है तो शिव काशी के लिये ही। कोई और कारण नही था। भगीरथ चाहते तो सीधे निकल जाते। पर नहीं, वे ठिठके, रूके फिर उत्तर की दिशा में चलते हुए विश्वेश्वर के निकट क्षणमात्र को रूके, प्रणाम किया, बढ़ गये। पीछे गंगा का वेग था। लेकिन गंगा रूक गयी, उन्हें शिव को स्पर्श जो करना था। कगार कटने लगे। चीख-पुकार मच गयी। ढोर-ढंगर भागने डूबने लगे। आर्तनाद सुनकर नये बन रहे तट पर शिव का आना हुआ। चरण-स्पर्श पाकर आहलादित गंगा पुनः भगीरथ के पीछे चल पड़ी। भगीरथ इसके बाद मंथर गति से चले। परिणामतः गंगा का पार चैड़ा होता गया।

आखिर हम अकिंचन किस प्रकार काशी का वैशिष्ट्य स्वीकार करे ! काशी धर्म संस्कृति की नगरी सदा से रही है। तब भी थी जब 1193 ई0 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने हजारो मठ-मंदिरों को ध्वस्त किया और हजारों काशीवासियों का बलपूर्वक धर्मपरिवर्तन कराया। उस गहन निराशा और अंधकार के काल में भी काशी की मूल जिजीविषा मृत नहीं हुई, संस्कृति की लौ जलती रही। विध्वंस होते मन्दिरों की मूर्तियों  को ब्राहमण, अहीर, मल्लाह और बहुत से काशीवासी लिये भागते रहे, मरते रहे। कोई इतिहासकार उन बलिदानों की कथा नहीं कहता। वह श्यामवर्णीय ब्राहमण जो ध्वंस हो रहे विश्वेश्वर मन्दिर से शिवलिंग लेकर भागा, उसे थोड़ी ही दूर पर मुगल घुड़सवारों ने भालों से बींध दिया। रक्तरंजित शिवलिंग से ब्राहमण का शव हटा शिवलिंग को चार बलिष्ठ अहीर युवक ले भागे। दो मारे गये। फिर तो यह बलिदानों की रिले रेस बन गयी। ये घटनायें लोककथाओं में जीवित हैं। फिरोज शाह तुगलक के जमाने मे जब काशी में कोई मंदिर बचा ही नही था तब भी यह हमारी धर्म संस्कृति की नगरी रही है। अक्सर मुस्लिम बादशाहों ने मंदिर तोड़े, समाज को तोड़ा। मंदिरों को किसी तरह जोड़-जाड़ कर पूजा अर्चना होती रही लेकिन जो समाज टूटा वह वापस नही लाया गया। कबीर उसी टूटे समाज की अभिव्यक्ति है जिसे कर्मकाण्डी ब्राहमण समझ ही नहीं सके। उन्हें अस्वीकार कर दिया गया। जहाॅ चार्वाक तक का दर्शन स्वीकृत है वहाॅ कबीर अस्वीकृत कर दिये गये। इस अस्वीकार ने विद्रोही कबीर को काशी का सच्चा प्रतिनिधि बनाया है। वरना वे क्यों घाट की सीढि़यों पर लेट ब्रहम वेला में गुरू रामानंद की प्रतीक्षा करते। प्रायः सत्तायें काशी की विरोधी रही है, अंग्रेजों ने अपने जमाने में नगर का सारा सीवर गंगा में खोल दिया। यह आस्थाओं पर परोक्ष हमला था। काशी ठगों लुटेरों गुण्डों का शहर भी बना। यहाॅ तक कि गुण्ड़ों को महिमांडित करने का भी दौर आया।

काशी के कष्ट को मराठों ने महसूस किया। मुगल साम्राज्य के पराभव के बाद इंदौर के शासक मल्हारराव होल्कर के शासन काल में काशी के धार्मिक सांस्कृतिक वैभव पुनः स्थापित करने की प्रक्रिया आरंभ हुई जो महारानी अहिल्याबाई होल्कर के काल में शिखर पर पहुॅची। तब तक अंगे्रजो का काल आरंभ हो जाता है। गुलामी के इस दूसरे दौर में अंग्रेजों ने मंदिरों को बक्श दिया। महारानी अहिल्याबाई का काल काशी के लिये संजीवनी बना लेकिन बहुत कुछ करना रह गया था। 

वाराणसी को केन्द्रशासित राज्य बनाने की माॅग, सदियों से हुये अन्याय के प्रतिकार के साथ-साथ काशी की विशिष्टता के स्वीकार का उद्देश्य भी लिये हुये है। कई मित्रों ने कहा यह असंभव है। इसके लिए, न राज्य न केन्द्र सरकार, कोई तैयार नहीं होगा। हो सकता है। लेकिन अन्य केन्द्रशासित राज्य कैसे बने हैं यह भी देख लिया जाये। 10 लाख आबादी का चंडीगढ़ केन्द्रशासित राज्य सिर्फ इसलिये बन गया जिसमें पंजाब हरियाणा के बीच स्वामित्व के विवाद को स्थगित किया जा सके। बहरहाल इस कदम ने एक नये बसाये गये योजनाबद्ध नगर को एक अलग पहचान दी है। पाॅडिचेरी जो 1947 से पहले फ्रेंच कालोनी था, अपनी फ्रेंच संस्कृति, वास्तु स्थापत्य की विशिष्टता की रक्षा के लिये केन्द्रशासित बनाया गया। यदि तुलना करें तो हम पायेंगे कि वाराणसी को केन्द्रशासित राज्य बनाने का तर्क इन दो राज्यों के लिए दिये गये तर्कों की तुलना में कही अधिक सबल है। फ्रेंच परम्परा की रक्षा के लिए यदि हम पाॅडिचेरी को केन्द्रशासित राज्य बना सकते हैं, तो काशी की विशिष्टता की रक्षा के लिए यही कार्य किया जाना सम्भव क्यों नहीं होगा ? काशी तो एक सभ्यता का केन्द्रबिंदु है। दुनिया के प्राचीनतम नगरों में से एक, विश्व के तीन महान धर्मो का केन्द्र यह गंगा व शिव का स्थान भी है। वेटिकन सिटी, मक्का शरीफ तो एक एक धर्म के केन्द्र है। यहाॅ तीन धर्मो के उद्गम है। 

अब उम्मीदें जगी है कि काशी धर्म, संस्कृति, कला ज्ञान की दिशा में आगे बढता हुआ आध्यात्मिक गुरू का स्थान ग्रहण करे। उम्मीदें तब भी जगी होगी जब मुगलों के बाद मल्हारराव होल्कर का शासन आया था। फिर 50 वर्षो तक अहिल्याबाई का शांतिपूर्ण उपलब्धि भरा शासन रहा। अंग्रेज आये फिर अंगे्रजों के बाद आजाद भारत में सब कुछ सेकुलर हो गया। आज राजनैतिक दिशा परिवर्तन के साथ काशी पुनः हमारी आशाओं का केन्द्र बन गई है। ये उम्मीदें सिर्फ नाली, सड़क, खड़जें व नागरिक सुविधाओं की मात्र नहीं है बल्कि उस सांस्कृतिक वैभव के लिये है जो काशी ने गुप्तकाल के बाद फिर कभी नही देखा। ये उम्मीदें उन कारपोरेट ठेकेदारों के आगमन की नहीं है जो किसी जिन्न की तरह सड़कें फ्लाईओवर, पुल बना डालेगे व नये नगर बसा देगे। बल्कि उम्मीदे शेष भारत की है जो काशी को अतिशय सम्मान व श्रद्धा से देखता है। नाना फड़नवीस ने टीपू सुलतान के विरूद्ध अंग्रेजों का साथ इसलिये दिया कि  विश्वनाथ मंदिर का पुर्ननिर्माण होने देने में अंग्रेज सहयोग दें। शिवाजी अपने राज्याभिषेक के लिये काशी से गागा भट्ट को बुला भेजते है। शेष भारत काशी और शिव को एकाकार एकरूप देखता है। 

अगर काशी को वैशिष्ट्य प्रदान करने के लिये इसे केन्द्रशासित प्रदेश का स्तर दिया गया तो यह काशी पर कोई एहसान न होगा। बल्कि काशी को उसका स्तर प्रदान करने की दिशा में एक प्रयास होगा। अगर ऐसा हुआ तो बहुत सी बातें  अपने आप बदलनी आरंभ हो जायेगी। काशी के प्रति नये सत्ता प्रतिष्ठान की सोच में परिवर्तन उस सांस्कृतिक पुर्नजागरण की दिशा को इंगित करेगा, जो राष्ट्र का भविष्य है। एक सज्जन ने यह भी कहा अरे यह तो बर्रे के छत्ते में हाथ डालने जैसा है। अगर और भी माॅगें उठी तो कहाॅ-कहाॅ केन्द्रशासित प्रदेश बनाये जायेगे। बड़ा आश्चर्य हुआ कहीं से आज तक कोई माॅग उठी है क्या ? सामान्यतया राज्य सरकारे इस प्रकार की माॅगों की विरोधी होंगी तो माॅग करने वाले लोग कौन होंगे ? कहा गया अमृतसर गोल्डेन टेम्पल के लिये माॅग उठी तो। अमृतसर तो पंजाब राज्य का हमेशा अंग रहेगा। पंजाब इतना बड़ा है भी नहीं। माॅग इसलिये नहीं उठ सकेगी क्युकी काशी से किसी भी नगर की तुलना संभव ही नही है। बहुत से तीर्थ है किंतु सांस्कृतिक राजधानी तो एक ही होगी और वह स्थान सिर्फ काशी के लिये सुरक्षित है। 

आर0 विक्रम सिंह
पूर्व सेनाधिकारी

Monday, October 6, 2014

काशी का सपना


काशी खंड में एक कथा है। अकाल इतना बड़ा था कि जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया। ब्रम्हा जी ने महाराज रिपुंजय से निवेदन किया। महाराज जो दिवोदास के नाम से विख्यात हुए, ने एक बड़ी शर्त रखी। शर्त के अनुसार शिव सहित समस्त देवताओं ने काशी से स्वर्ग प्रस्थान किया। तब महाराज दिवोदास ने संन्यास छोड़ कर, काशी को राजधानी बनाया और आदर्श शासन व्यवस्था स्थापित की। देवता नहीं थे, लेकिन धर्म का साम्राज्य था। अर्थात आदर्श राज्य के लिए आवश्यक है कि सत्ता का मात्र एक केंद्र हो, विकास की शक्तियां विभाजित न हों। काशी में शिव हैं गंगा हैं विष्णु भी हैं। नगर तो जैनों, कबीरपंथियों और बौद्धों का भी है। हिंदू हैं तो कबीर के जुलाहे भी हैं। वाराणसी में सभी का योगदान है। चुनावों की गहमागहमी के बाद अब विकास के सपने हैं। लक्ष्य है पर्यटन विकास, उद्योग विकास, रोजगार वृद्धि, व्यापार को प्रोत्साहन, नगर सुधार व नगर विकास, शिक्षा, संस्कृति, पठन-पाठन आदि। वाराणसी के सर्वागीण विकास के लिए सड़कें, ड्रेनेज, सीवरेज, पर्यावरण, बाजार, मंडियां आदि अवस्थापना के महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। चूंकि वादे बड़े हैं इसलिए जिम्मेदारी का ताज केंद्र के सिर आएगा। यदि लक्ष्य बड़ा है तो उसके अनुरूप संसाधन भी तो हों। महाराज दिवोदास व शिव की महान नगरी काशी आज मात्र एक जिला है। बुनकरों के लिए योजना, शिक्षा-संस्कृति के विकास की रूपरेखा, गंगा सफाई अभियान, आध्यात्मिक-सांस्कृतिक राजधानी, क्योटो के तर्ज पर आदर्श सांस्कृतिक नगर की सोच, कुल मिलाकर लगता है कि सौदा महंगा है। महारानी अहिल्याबाई होल्कर के बाद पहली बार वाराणसी के लिए इतना कुछ सोचा जा रहा है। वाराणसी नगर भक्तों, तीर्थयात्रियों के लिए बसा है, स्वयं अपने लिए नहीं। यह नगर कभी गंगा के घाटों तक सीमित था। तीर्थ क्षेत्र की वृद्धि के साथ वरुणा व असी नदियां नगर की सीमारेखा बनीं और नाम वाराणसी हुआ। आज आबादी का जबरदस्त दबाव है। नागरिक सुविधाएं, सड़क चौड़ीकरण की सीमाएं हैं, अत: नगर की सांस्कृतिक सीमा वरुणा असी के पार पंचकोस तक हो जानी चाहिए। रामनगर, मुगलसराय को व्यवस्थित उपनगरों का स्वरूप दिया जाना स्वयं वाराणसी के विकास के लिए जरूरी हो चुका है। बाबतपुर से सारनाथ मार्ग स्मार्ट सिटी योजना के लिए आदर्श है अन्यथा अवैध कालोनाइजरों के हाथ पड़कर विश्वस्तरीय संभावना का यह क्षेत्र बर्बाद हो जाएगा। इसी प्रकार मिर्जापुर मार्ग पर भी उच्च संभावना के क्षेत्र हैं। सारनाथ को विश्वस्तरीय उपनगर बनाने के लिए अलग से सारनाथ का मास्टर प्लान बनाने की आवश्यकता होगी। वाराणसी की अराजकता ओढ़ी हुई है। नागरिकों में अपने दायित्व की बड़ी स्पष्ट समझ है। वाराणसी के दिनों में मैं नगर निगम में बाबा हरदेव सिंह का डिप्टी था। नगर आयुक्त हरदेव सिंह ने अपील की कि बनारस के लोग नगर निगम के फुटपाथ, नालियों से अतिक्रमण हटाकर बरसात से पहले हमारी नालियांहमें वापस दे दें। नागरिकों का जैसे दायित्वबोध जागृत हो गया हो। लोगों ने पटी नालियां रात-रात भर खोदी। मलबा निकाला, ईंटें जोड़ीं और नालियां बनाकर निगम को वापस कीं। वह समय भुलाए नहीं भूलता जैसे कि कोई क्रांति आ गई हो। करीब 15 दिन बनारस नहीं सोया। पूरा बनारस काम पर था। मजदूरों का अकाल हो गया। कटिया के बल्ब, पेट्रोमैक्स की रोशनी में हजारों अनभ्यस्त हाथ एक हाथ में मोबाइल और दूसरे में फावड़ा लिए नालियां खोद रहे थे। जब पहली बार नगर में हाटमिक्स प्लांट से सड़कें बननी शुरू हुई तो बनारस के सबसे खराब सड़क वाले मुहल्ले को पहले चुना गया जो एक मुस्लिम बाहुल्य मुहल्ला था। भीड़भाड़ कम होने के बाद रात को काम शुरू हुआ। एशा की नमाज के बाद करीब 50 नमाजियों की भीड़ ने मशीन से बनती सड़क का नजारा देखा। इतना शोर मचा कि करीब 500 की भीड़ इकट्ठा हो गई। न जाने कहां से मालाएं लाकर दोनों ड्राइवरों को लाद दिया गया। इतनी रौनक, इतनी खुशी कि देखते ही बनता था। बनी हुई गर्म सड़क को हाथों से मुहल्ले वाले सहलाते थे। फिर यह हर मुहल्ले की कहानी हो गई। नगर निगम में धन की कमी थी। कर्मचारियों के वेतन की समस्या थी। विकास के बहुत से काम करने थे। सब कुछ आय के संसाधन बढ़ाकर किया गया। वह समय तो जैसे वाराणसी में हरदेव सिंह का शासनकाल था, जो हमेशा याद किया जाएगा। उन्हीं दिनों नई काशी योजना सोची गई। बाबतपुर रोड पर करीब पांच हजार हेक्टेयर जमीन का सर्वे प्रारंभ हुआ। लेकिन यह महत्वाकांक्षी योजना अवैध कालोनाइजरों और उनके सहयोगी नेताओं के षड्यंत्र का शिकार हो गई। वह इलाका जहां नई काशी योजना चलनी थी आज अवैध निर्माणों से पैक हो चुका है।आज वाराणसी पर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीयफोकस है। काशी क्योटो की बातें हैं। वह सब किया जाना है जो पिछली कई शताब्दियों में नहीं हुआ। सांस्कृतिक राजधानियां मात्र इच्छा करने से नहीं बनतीं। राष्ट्र की जिजीविषा, जीवनी शक्ति को साध कर केंद्रित करना पड़ेगा। इस काशी में भारत का प्राण बसता है, यहां जो कुछ होगा वह काशी के नागरिकों के लिए नहीं संपूर्ण भारत के लिए होगा। क्या इस महत् लक्ष्य की पूर्ति नगर निगम, विकास प्राधिकरण, गंगा प्रदूषण इकाई या स्थानीय प्रशासन के बस की बात है? फिर गंगा व काशी के गुरुतर महत्व को स्थापित करने व एक विश्व नगरी तक स्तर बढ़ाने, आध्यात्म व ज्ञान का केंद्र बनाने का कार्य कैसे किया जाएगा? काशी का प्रबुद्ध तो राष्ट्र का भाग्य लिखता है उसकी जन्मकुंडली कोई और कैसे बांचेगा? प्रदेश अपने नगरों में पक्षपात नहीं कर सकता। अत: केंद्र की भूमिका मुख्य है। वाराणसी को केंद्रशासित प्रदेश का स्तर देते हुए नगर क्षेत्र को वैश्विक स्तर तक ले जाने का सफल प्रयास किया जा सकता है। रोम में स्थित विश्व के ईसाइयों की धार्मिक राजधानी वेटिकन सिटी नगर ही नहीं है, बल्कि एक संप्रभुतासंपन्न देश है। भारत के लिए वाराणसी की भी वही हैसियत है। यदि हमें वाराणसी को सांस्कृतिक राजधानी के रूप में विकसित करना है तो केंद्र शासित वाराणसी एक आवश्यकता है। वाराणसी के निकट स्थित नगर स्वत: ही सांस्कृतिक राजधानी प्रक्षेत्र की योजना के भागीदार बन जाएंगे। काशी ने जहां अत्यंत वैभव देखा है वहीं यह नगर अपने मंदिरों के ध्वंस का भी साक्षी है। इसने अपने समाज की प्रताड़ना देखी और उनके धर्म परिवर्तन की मर्मातक पीड़ा भी ङोली है। ऐसा कहां है विश्व में कि जहां शिव भी हों और बुद्ध भी। कबीर हों, रैदास हों और तुलसी भी। इतिहास के इस्लामिक और अंग्रेजी दौर का क्या कहें, आजाद भारत में भी कोई वाराणसी की परवाह करता नहीं दिखा। अब समय आ गया है। आज नेतृत्व भी है, सजग नागरिक भी हैं और दिशाएं भी स्पष्ट हैं। पतवार काशीवासियों के हाथ में है। सदियों के अंधकार के बाद वाराणसी का स्वर्णिम प्रभात उदय होने को है। 


(लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं)


Thursday, September 11, 2014

A CASE FOR ‘URBAN MANAGEMENT’ AS A SUBJECT FOR UNIVERSITY COURSES


‘India lives in the villages’ as the saying goes. We have been a rural economy, no doubt. But India owns cities as well. Now after 65 years of Democracy we have grown beyond the myth that village is innocent and city is cunning.  At the time of independence our urban areas had just 17.3% of the population. As per the latest census, the urban share comes to 32% roughly 37 crores of the people. Almost 6 Crores more than the entire population of America. With no efforts towards regulating and planning our cities have grown like octopus on each and every road leading to them. Leaving aside a few modern ones most of the towns are rural Bazars. It is with the start of the economic liberalization our cities, their problems and plights have started coming in the focus. Cities are engines of growth. But the structures which exist for the management of the cities are primitive, rudimentary. Municipal bodies often survive on Government grants. They have meager income compared to the immense responsibilities they are supposed to bear.
          The planning for human resources development is nonexistent. Mostly we have incapable staff, hardly able to understand the changing urban scenario.  Our corporators generally have a limited vision. For general public municipality is there simply to clean the streets and collect taxes once in a while. With no proper enforcement of municipal rules, municipalities remain on the receiving end all the time. If you take the work of enforcing the rules seriously it becomes your problem and you face it.
          The need of the hour is to change our stereotype mindset, overhaul the machinery and increase their capacity. Even Municipal Corporations, leave aside small local bodies, need consultants for each and every project. Mostly someone else conceives our projects.  In smaller Municipalities and Town areas it is often the contractor who manages and makes the projects. It all goes to show that the officers and municipal representatives alike find it difficult to understand what the need of the city is. That is why our cities are badly managed. For example even in scanty rains we see instant cases of water logging in streets and muhallas. Our municipal engineering functions just at the base level of competence.
          Serving as Commissioner, Municipal Corporation of Kanpur and later on at Allahabad, I felt that managing a city is a serious job. It is like taking care of a government which is running underground. Our citizen by and large remain unaware of what all is being done for them. When we look at the available stock of officers, supervisory staff, it becomes apparent that they are just not cut out for the serious job they are responsible for. A total casualness prevails. In this world of work shirkers and self servers, if anyone is just a bit sincere he remains in great demand. I also felt the acute need of such staffs, engineers, municipal officers who could understand the changing patterns. When the GIS system of identifying the housing properties in the city began to be introduced   there was a big opposition all over. Entire Tax department, almost all municipal officers, entire lot of elected representatives, including the Mayor, everyone was strongly opposed to it. GIS survey teams were hounded out and at time manhandled also.  There were frequent agitations, Juloos, Dharnas in the city.  It continued for months. Once a few busloads of people went to gherao even Vidhan Sabha in Lucknow! Such intense was the opposition to the introduction of GIS. The GIS was infact an instrument of correct evaluation of property tax. There were schools, offices, showrooms even a few cinema halls recorded as residential properties. This faulty assessment or no assessment at all was a major cause of the corruption in tax department. Despite all the opposition, a small group of committed officers and staff, most of them employed on contract, went apace with the task. Kanpur became the first success story of the country in converting the GIS map data into real house taxes. Finally those two lakh houses were added which had remain out of assessment list since long. The tax net increased from almost Rs. 32 crore to Rs 108 crores. An increase of more than three times in one year! Unknowingly Kanpur had created a national record. This was acknowledged by SCOTCH group also in the year 2011. We were the recipient of the award.  Later on our State Government acknowledged our success by giving us 'E-Governance Award' for the year. But this big success story could not be repeated with equal vigour in other cities of UP.
          Similarly when Kanpur started its experiment with PPP model in solid waste management it was the same story being repeated again. It was again rejected by lot of elected representatives, entire sanitation department, inspectors and sweeping staff alike. They even went on a month long strike as well. Mayor, Corporators were dead against this change. They campaigned against the scheme and opposed vehemently the collection of user charges from the households in door to door collection of the waste. Despite the fact that the user charges were just one rupee for a day!  But against heavy odds the system was put in place. Gradually civil society and local media come forward to support us. We all, our team of officers frequently reached out to the people in mohallas, markets, to their association, clubs and all over. Sustained efforts were made for personal contacts and gradually things improved.  Kanpur solid waste management became as big success and the city was awarded by the Hon’ble Prime Minister in year 2011 JNNURM award for its pioneering work.
The inertia against the charge is very strong. In Municipalities, over a period very deep vested interests have got entrenched. In order to keep their interest intact they always prefer status quo. It is a hard task breaking those barriers. Question comes to mind why are we not capable to see the advantages of new system? The interest groups, the union are part of the status quoist mindset. Whenever we discussed these new innovative changes with our corporators, they agreed in person yet remained susceptible, doubtful in public.
          The problem here, we gradually realized was the very structure of the local bodies where check and balance are designed in such a way which creates a situation of constant tug of war among various interest groups such as Municipal Commissioner, Mayor, corporators, Unions, contractors and local politicians. Under the circumstances there is no scope for any initiative from any of the above constituents. The system becomes vision deficit and innovative thinking takes a beating. The above innovations which I mentioned were literally bulldozed through.
The second problem with the local bodies is that their work commands very low waitage in the public eye. The impression is that they do just the menial jobs of scavengers and cleaners. Since local bodies are in constant shortage of funds they find difficult to change the perception about themselves by vigorous developmental activities. Thirdly the efficiency level of officers and supervisory staff is fairly low. They are not exposed to the higher virtues of urban management. But our limitation is that this officer lot is the only instrument which we have for bringing about the desired changes in the system.  It is far easier to educate and motivate the group of city officers or managers than to educate the entire city and their representatives.  
I felt with all the seriousness that this all should be part of an academic study, with well thought out syllabus, in university curriculums. We do have subjects like Business Management, Public administration. Why cannot we have a subject like ‘Urban Management’? With growing urbanization, there is urgent need for new ideas, new approaches to be introduced. It is wakeup time or we are going to miss the bus for urbanization.

The works in the municipal bodies are not properly organized. No one works to a plan. No effort to build teams is seen. Being a good worker does not pay any dividends. Every segment has their safe anchor from where it refuses to budge.  They show no motivation for learning any further in their professional direction. But we need officers with knowledge of urban sector. There is an urgent need of urban and municipal education. We need MBA like professionals for the management of the cities.
          During a visit to Administrative Staff College of India, Hyderabad (ASCI), I proposed to a prominent faculty member Pro Chary that if I could get a syllabus on degree course in ‘Urban Management’, I will request Vice Chancellor of the Kanpur University to adopt it. Since AND college run by Kanpur Municipal Corporation, is affiliated to Kanpur University, it will be quite easy for us to run this course. We may get to run the degree course ourselves to begin with. He was surprised as request was coming from a Municipal Commissioner. Designing and running the courses is the sole prerogative of academicians. His reply was equally surprising to me also. ASCI does not have such a degree course. So far as he remembers there is no University, in the country which, run such a course on urban or city management. Still he put some people to search on the internet but after two days search the result was the same. No one runs urban or municipal management courses anywhere. A few courses on city planning and environment studies are there but they were of no use to us. It is unbelievable in a country where more people live in cities than the entire population of America.
          Then this idea came to me. Who, other than ourselves, serving in a municipal corporation is better placed to write a syllabus on urban management. And I told him we will do it. Then another problem came. Suppose with all the efforts we write the syllabus and also put it up to the university, who will do the teaching?  From where the teaching faculty for urban management will emerge? Pro chary came to our rescue. Once the syllabus is put in place and accepted by the University of Kanpur they (ASCI) will give faculty support. Some expert environmentalist and retired Municipal Officers with reputation may be of immense use for building up the faculty.  It was agreed upon then and there to write a letter to Pro Sahegal the then Vice Chancellor Kanpur University by ASCI committing faculty support if the university accepts the syllabus of urban management put up to them by Kanpur Municipal Corporation.  A letter was dispatched to V.C. Kanpur accordingly.
Back in Kanpur a syllabus committee was set up under leadership of Dr. Umakanti Tripathi, Principal AND Degree College. All the aspects of municipal functioning, urban needs were examined. Whatever limited books were available on the subject were referred. Our in-house meetings and discussion took place regularly. Finally it was put up to the university’s Academic Council in a record time of three months. After completing their prolonged formalities it was finally sent for Mahamahim Governor of U.P. for his final approval. Which was granted after some usual bureaucratic delays. Now this three year degree and one year diploma course is part of the curriculum of Kanpur University. I think it is for the first time in our Country that the subject of Urban Management has been accepted as a full fledged degree course by any university. Dr. Umakanti Tripathi the then principal AND College Kanpur did a commendable job against heavy odds. It is due to her efforts this syllabus could be put together. The pledge by ASCI for faculty support could not be followed up as I got transferred from there and people following me possibly had different priorities.
          The aim of the urban management course is to provide a broad understanding of the functioning and responsibilities of local bodies. This knowledge is a must for those who are serving and also for those who are to join and be part of the municipal administration. It will create a cadre of city administrators & managers whose shortage is being felt very painfully all over the country.
Secondly it provides an opportunity to the people dealing with urban local bodies in any form as an NGO, as service providers or as suppliers of municipal equipments. They will understand the local body’s system & administration and find their suitable role in it.
Thirdly Urban Management graduates could be an excellent asset to the partner companies which are serving as PPP associates to local bodies. Moreover this basic degree course can form a base for higher studies in urban management, city planning, disaster management, environmental studies. The subject may lead to various vocational off shoots: municipal engineering, city lighting courses, municipal tax planning and administration, traffic planning and energy conservation so on.
Last but not the least important is the task of making students, people aware of the cities, their problem and opportunities. It will strive to make the common citizen more response to their cities and environment.
The degree course is divided into six semesters: The course is a mix of theory and practice. I must admit the course was created in a vacuum with no previous examples to follow. But in due course it will be improved upon. It may lead towards various allied subjects for specialization and other degree courses.
But the story has not ended here. It goes further. The forces of the old system have caught on again. The GIS initiative is being killed. Tax staff has gradually started nibbling at the gains in tax increase. In the garb of rationalizing the GIS assessments, taxes are being reduces with impunity. Similarly the PPP experiment in solid waste could not sustain itself. The nationally acclaimed story of Kanpur has petered off. The partner company says they are not being paid adequately. Corporation blames that partners are not interested in collection of user charges. A sort of beaurocratisation of the experiment has taken place. The vigour of initiative is lost. The Kanpur experiment has also exposed the myth that privatisation could give a solution to urban problems. In fact they have gone down to the lowest level of competence. After a promising start partners went on a different line. They unfortunately employed third rate managers. Financial mismanagement became the order of the day. The company had more labour strikes compared to even municipal staff. It appeared at times that their management is deliberately acting irresponsibly. We had hoped that this partnership will bring the goods of private sector to our Corporation, but what happened was the other way round. Our partners adopted all the negative factors of a Govt. department instead. When initiatives are not followed up vested interests tend to gain upper hand. Now we have to start all over again.
Here the lack of municipal education comes as a major impediment. The generalist cadre is not in a position to handle these issues. With these new initiatives coming under strain, 'good old days' theorists have a field day. Moreover, the Kanpur effort and its success was an acknowledgement of the fact that our cities are in dire need of such initiatives. These efforts such as GIS, tax reforms, solid waste innovation, and property management could be done more purposefully if our officers have modern approach towards urban management. This subject will inculcate a sense of purpose among the city managers. The course needs to be taken up by all capable institutions and universities. With this aspect in mind I did approach Prof. P.B. Sharma, Vice chancellor of Delhi Technological University. His response filled me with great enthusiasm. If this initiative is taken up by the Government, Ministry of HRD and Urban Development, it can go a long way in creating the cadre of badly needed City Managers. This subject will become an effective tool in the hands of the civil society also. We have to develop an Indian Philosophy of ‘Urban Management’ and vigorously implement it. Our story of Urbanization starts with oldest cities of Indus Valley. In the description of foreign writer we read about the well laid out cities of Magadh, Pataliputra, Ujjaini, Kashi, and Takshshila. We were the richest economy of the world and our cities were the creators of the wealth. Now we witness the scenes of the vicious anarchy in our cities. An effort in right direction will change the face of our cities which are poised to lead the charge of economic growth.

R. Vikram Singh I.A.S.
Ex. Captain,
Special Secretary,
Govt. of U.P.




अंधकार के द्वीप


केन्द्रपाड़ा पहुँचने के बाद पता लगा कि वह मंदिर अभी 34 किमी0 दूर केरड़ागढ़ गाँव में है। केरड़ागढ़ का रास्ता पहले तो कस्बाई सड़क का है जो आगे चलकर गाँव की सड़क फिर बंधे की पटान में तब्दील हो जाती है। बाँई ओर ब्राहमणी नदी का चैड़ा पाट है। आगे चलने पर दाहिनी ओर हँसुआ नदी का भी उतना ही चैड़ा पाट दिखता है, इक्का दुक्का नाँवे, मछली के जाल डाले मछुआरे। रास्ते में सोचता रहा कि आखिर कैसे उस गाँव में इतनी दकियानूस मानसिकता बनी हुई है। दलितों के मंदिर प्रवेश पर विवाद तो गुजरे जमाने की बात है। एक साल का अरसा हो गया होगा जब अखबारों में आया था कि केन्द्रपाड़ा में दलित समाज के सदस्यों को मंदिर प्रवेश से रोका गया है। वह दीवार कौन सी है जिसमें बने नौ छेदों से ही दलितों को दर्शन की अनुमति रही है। कुछ दिन बाद पता चला कि समस्या का तात्कालिक समाधान हो गया है और दलित समाज के लिये दर्शन की अलग से व्यवस्था करा दी गई है। अलग से दर्शन का मतलब यह कि सामाजिक विभेद का समाधान नहीं हुआ। यह भी छपा कि उच्च न्यायालय के निर्णय के बावजूद दर्शन नहीं हो पा रहा है। अखबार इसके बाद चुप हो गये। जाहिर है रोज ब रोज बढ़ते समाचारों की भीड़ में यह खबर कमजोर होकर हाशिये से बाहर हो गई। लेकिन सवाल बना रहा। 
फकत इस सवाल के जवाब की तलाश में हम भुवनेश्वर से केन्द्रपाड़ा और फिर वहाँ से केरड़ागढ़ के लिये बंधे पर बनी इस सड़क पर हम हिचकोले खाते चले जा रहे थे। राजनगर एक छोटी सी कस्बाई मार्केट है यहाँ से 4 किमी और चलने के बाद केरड़ागढ़ गाँव दिखने लगता है। बंधे की सड़क के दोनों ओर नारियल के वृक्षों की पृष्ठभूमि में लकड़ी के खम्भों पर फूस के घर, घरों के बाहर न जाने किस नस्ल के बड़ी सीघों वाले बैल बंधे थे। साइकिलों पर स्कूल जाती लड़कियाँ गाँव को जितना सोचा गया उतना पिछड़े न होने का आभास दे रही थी। 
विवाद वैसे तो सदियों पुराना था। दलित समाज का मंदिर प्रवेश विवाद कोई आज का नया मुद्दा नहीं है। उड़ीसा के केन्द्रपाड़ा में यह करीब तीन साल पहले वर्ष 2005 में कार्तिक पूर्णिमा के दिन जिंदा हुआ। दलित बस्ती के कुछ नये पढ़े-लिखे लड़के-लड़कियाँ जिनकी संख्या 4-5 थी, नौ छेदों वाली दीवार से दर्शन के बजाय दैवी दासत्व के बन्धन को तोड़ते हुये सिंह द्वार से मंदिर में प्रवेश कर गये। उस क्षेत्र में यह अनहोनी घटना थी। मंदिर अशुद्ध करने के कारण लगाया गया जुर्माना देने से उन्होंने इन्कार कर दिया। जैसा कि राज किशोर मुदिली ने बाद में बताया कि दलित समाज ने विरोध में सत्याग्रह का मन बनाया। उच्च न्यायालय ने मंदिर प्रवेश के अधिकार की ताईद की और प्रशासन ने दिनंाक 14.10.2007 को मंदिर प्रवेश की तिथि 16.10.2007 के लिये नियत की। पुजारियों द्वारा विरोधस्वरूप पूजा अर्चना बंद कर दी गई और नियत तिथि पर निकटवर्ती ग्रामों से लगभग पांच हजार लोगों ने आकर मंदिर पर घेरा डाल दिया। दलितों के मंदिर प्रवेश और ठाकुर जी के दर्शन की तैयारियाँ धरी की धरी रह गईं। पूजा का सामान, फूल मालायें, ढोल नगाड़े बेकार हो गये। अफवाहें यहाँ तक थी कि दलित बस्ती फूंक दी जायेगी लेकिन स्थानीय प्रशासन ने विवेक से काम लिया। वह दिन एक मुक्ति दिवस की तरह दलितों की जिंदगी बदल सकता था। वे उस हीनभावना से मुक्त हो जाते जिसके अहसास ने न जाने कितनी पीढि़यों से उन्हें सामाजिक विकलांग बना दिया था। मंदिर का घेरा डाले लोगों को, इन साठ वर्षों की आजादी में किसी ने नहीं बताया कि तुम सब एक ही समुदाय, एक सभ्यता के लोग हो। वह सामाजिक आन्दोलन जिसे गांधी, अम्बेडकर के बाद बदस्तूर चलते रहना था, अब उनके बाद उसका दूर-दूर तक कोई वारिस नहीं था। 
गाँव के तालाब को पार कर आगे ग्राम के समर्थ, सवर्ण जैसे लोगों की बस्तियाँ हैं। इनके मकानों का काम खत्म होने के बाद सफेद चूने से पुते हुये मंदिर के दर्शन होते हैं। गाँव के लिहाज से यह बड़ा मंदिर है, बाउण्ड्रीवाल से घिरा। किसी सरकारी सड़क योजना के द्वारा मंदिर के सामने और इससे आगे की सडक चैड़ी कर स्थान को भव्यता प्रदान की गई है। हमारी कार मंदिर के सामने रूकी। बाहर से बंद फाटक में ताला लगा था। मंदिर के सामने खड़े एक धोती पहने वृद्ध से पुजारी ने हमारे साथ आये शिक्षा विभाग के कर्मचारी को स्थानीय उडि़या में बताया कि मंदिर बंद हो चुका है। 12.30 पर बंद हो जाता है। फिर 2.30 पर खुलेगा। निराशा हुई कि बड़ा लंबा इंतजार करना पड़ेगा। घड़ी देखी तो 12.20 ही हुये थे। पुजारीगण सशंकित हो रहे थे। न जाने क्या सोचकर दर्शन के लिये मुख्यद्वार खोल दिया गया। हमारे इंतजार में कुछ स्थानीय ग्रामवासी भी थे। वे भी साथ आ गये। फिर पुजारियों से शिक्षा अधिकारी की बातचीत के बाद और मोबाइल पर कदाचित मंदिर प्रबंधक से बात करने के बाद हमारे मंदिर प्रवेश की संभावना बनी। मंदिर के मुख्य प्रवेश पर ही तीन पाइप लगाकर प्रवेश रोक दिया गया है। पुजारियों ने बताया विवाद के बाद से ही जिला प्रशासन की सहमति से पाइप लगा दिये गये हैं। अब चाहे सवर्ण हो या दलित, सबका प्रवेश रोक दिया गया है। दर्शन बाहर से ही होता है। बिजली की कटौती की वजह से मंदिर के गर्भगृह में अंधकार था। जगन्नाथ जी की मूर्ति दृष्टिगत नहीं हो रही थी। एक अपेक्षाकृत नवयुवक पुजारी जो दास ब्राह्मण था कुछ हिंदी बोल व समझ रहा था। पूँछे जाने पर कि आखिर विवाद क्या था, उसने बताया कि ये दलित लोग मंदिर में प्रवेश करना चाहते थे। उनके प्रवेश की कभी परंपरा नहीं थी इसलिये रोका गया। इसी कारण विवाद हुआ। दोनों पक्ष के लोगों में विवाद बढ़ने पर मंदिर में ताला डाल दिया गया। जिला प्रशासन, पुलिस आदि के सहयोग से फिलहाल यह बैरियर लगाकर प्रवेश बंद कर दिया गया है। अब बैरियर के बाहर से ही दर्शन कर सकते हैं। अंदर कोई प्रवेश नहीं करेगा। पहले क्या था ? पूँछा। पहले सवर्ण समाज के लोग मंदिर में स्तंभ तक अंदर आते थे। दलित वर्ग बाहर से दीवार में बने नौ छेदों से ही दर्शन कर सकता था। वह दीवार जो अपमान का प्रतीक थी, अब हटा दी गयी है। लेकिन उनका प्रवेश हमेशा से वर्जित था। मैने पूँछा कि अंदर आने देने में परेशानी है। जवाब था कि इनके प्रवेश की परंपरा ही नहीं रही है। परंपरा है इसलिये हम इसे तोड़ नहीं सकते। अन्य पुजारी मूकभाव से सुन समझ रहे थे। भाषा एक बड़ी मजबूरी थी। दाहिनी ओर का लोहे का गेट खोला गया। हम लोग स्थानीय ग्रामवासियों के साथ मंदिर प्रांगण में आ गये। नवयुवक पुजारी हमें मंदिर के बगल के एक रास्ते से मंदिर के भवन के अंदर ले आया। आगे आने पर स्तंभ के बाद गर्भगृह था। अंधकार में वहाँ कुछ दिख नहीं रहा था। कैमरे के फ्लैश की चमक में अपने बड़े विस्फरित नेत्रों से कृपा की वर्षा करती भगवान जगन्नाथ की मूर्ति दिखी। गर्भगृह के सम्मुख दण्डवत् प्रणाम के बाद हम लोग बाहर आये और पुजारियों के साथ मंदिर की एक परंपरागत परिक्रमा की गई। बैठने की गुंजाइश तलाशते हुये हमलोग मंदिर परिसर में दाहिने हाथ पर बने एक दालान के बरामदे में आ गये। बरामदे में एक तख्त और दो लकड़ी की कुर्सियों पर सारा कारवाँ जम गया। आर0सी0प्रधान दुभाषिये का काम कर रहा था। वह ओडिया है। बातें प्रारम्भ हुई। नाम, आपका नाम और आपका ? क्या जाति है ? खोण्डायत, खोण्डायत मतलब ? तलवार लेकर चलने वाला। क्षत्रिय ? नहीं क्षत्रिय से नीचे। क्षत्रिय भी है कोई। क्षत्रिय कोई नहीं है। गाँव में ब्राह्मण है करीब 5 प्रतिशत, वैश्य समाज के भी कुछ लोग हैं। बाकी ज्यादातर, खाण्डायत, सॅाई वगैरह हैं। वे सब मुख्यतः कृषि कार्य करते हैं और आजकल पिछड़ी जाति में आते हैं। ग्राम में ब्राह्मण हैं, क्षत्रिय क्यों नहीं हैं ? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था। आखिर हिंदू धर्म चतुवर्ण धर्म कहा गया है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। ब्राह्मण है, कुछ वैश्य हैं, शेष बचे शूद्र हैं। क्षत्रिय कहाँ गये ? शूद्र लगभग 20 प्रतिशत हैं। अलग बस्तियों में रहते हैं। 
बात मंदिर प्रवेश विवाद पर आकर ठहरती है। विवाद है क्या आखिर ? वो दलित लोग अपने जुलूस के साथ बाजा बजाते हुये एक शोभायात्रा के रूप में मंदिर में प्रवेश चाह रहे थे। उन्हें मना किया गया। वे कभी अंदर नहीं आये हैं। उनके पूर्वज भी कभी मंदिर में नहीं आये है। मैने पूँछा, अगर वे जुलूस में नहीं बल्कि अगर व्यक्तिगत रूप से आये तो प्रवेश हो सकता है ? नहीं, सिर्फ बाहर से ही दर्शन, प्रणाम कर सकते हैं। पुराने लोग कोई समस्या नहीं करते थे। अभी भी नहीं करते हैं। नये लोग ही आंदोलन चला रहे हैं। उनके प्रवेश की कोई परंपरा नहीं रही है। इससे परंपरा टूटती है। यह परंपरा के विरूद्ध है। सवाल बना, लेकिन वे भी तो हिंदू समाज के ही हैं, फिर क्यों प्रवेश नहीं है ? उन्हें कोई जवाब नहीं सूझा तो कहा कि वे क्यों यहीं प्रवेश करना चाहते हैं ? जब कहीं भी किसी भी मंदिर में प्रवेश नहीं है तो यही के जगन्नाथ मंदिर में क्यों वे समस्या पैदा कर रहे हैं ? क्या ? क्या मतलब ? मेरा तो जैसे सर घूम गया। इतनी आसानी से कह दी गई बात जहर बुझे तीर के समान लगी। नहीं ....! यह कैसे ....!
एक ने कहा, अगर वे यहाँ प्रवेश कर लेते तो अन्य मंदिरों में भी प्रवेश करने का प्रयास हर जगह होने लगता। बड़ी अव्यवस्था हो जाती। यहाँ प्रवेश का प्रयास रोक कर सब जगह की आशंका समाप्त कर दी गई है। पूरी उड़ीसा में समस्या हो जाती। कहीं भी प्रवेश नहीं! मैने प्रतिवाद किया कि पुरी के जगन्नाथ मंदिर में तो प्रवेश है। जवाब मिला जाति बताकर प्रवेश नहीं है। पण्डों को जब मंदिर में किसी के हरिजन होने का पता चल जाता है तो उसे मारपीट कर भगाया जाता है। विचारों की उद्धिग्नता कुछ बोलने सोचने नहीं दे रही थी। ऐसा भी संभव है! आजादी के 60 साल सिर्फ लफ्फाजियों में बीत गये। कहीं प्रवेश नहीं। तो 60 साल की आजादी, लोकतंत्र, स्वनामधन्य महान नेताओं के बावजूद, अनगिनत चुनावों के बावजूद, अछूतों के उद्धार के न जाने कितने नारों, संकल्पों के बावजूद हम वहीं के वहीं खड़े हैं। लगा कि शिराये फट जायेंगी। सारे आंदोलनों, सारे गांधियों, अम्बेडकरों के बाद भी कहीं कुछ नहीं। 
हमारा अचानक चुप हो जाना गाँव वालों को अस्वाभाविक जरूर लगा होगा। मैं जज्बातों के उबाल और अकर्मण्यता से पैदा गहन निराशा में अपने को संयत करने के प्रयास में था। ऐसा लगा कि हम लोग जैसे अलग-अलग ग्रहों के वासी हैं। हमारी सोच एक हो ही नहीं सकती। आगे और बात करने सवाल पूंछने की जैसे इच्छा समाप्त हो गई। अब तो किसी बात का कोई अर्थ नहीं था। लेकिन ये ग्रामवासी भी कोई घाघ, चालू, दादा या धूर्त किस्म के लोग नहीं हैं। सीधे-साधे लोग ही हैं। इनके लिये तो यह बड़ा स्वाभाविक सा स्वीकार है असलियत का। जिसे हम समाज की सड़ांध कहते हैं वह इनके यहाँ सड़ांध नहीं सामान्य कार्य व्यवहार जैसा है। अगर ये घाघ, धूर्त होते और यह उनका जवाब होता तो इतनी बेचैनी न होती और ऐसे में इनकी नकारात्मक, दुष्ट मानसिकता के मत्थे इस समस्या को देकर एक आसान सी थ्योरी बन जाती। लेकिन ये वैसे नहीं है। अगर ये दलितों के मंदिर प्रवेश का विरोध अपने अन्तर्मन से, संस्कारों की गहराई से अत्यंत स्वाभाविक रूप से कर रहे हैं तो..... तो..... हम कहाँ जायेंगे ? अब तो हम गुलाम भी नहीं हैं। आजादी के बाद के इस 60 वर्षों के अंतराल को हमने किसी तरह गँवाया है! मैं तो यह सोच कर आया था कि केरड़ागढ़ शायद देश के इक्का-दुक्का ऐसे बचे खुचे ऐसे स्थलों में से होगा जहाँ दलितों का मंदिर प्रवेश अभी भी समस्या है। लेकिन केरड़ागढ़ तो टेस्ट केस जैसा साबित हुआ है। अगर यहाँ दलित मंदिर प्रवेश में सफल हो जाते तो और जगह भी प्रवेश का प्रयास करते। यह इस उड़ीसा के दलितों का अंतिम नहीं बल्कि प्रथम प्रयास था। लोकतंत्र और आजादी के 60 वर्षों बाद वे अब प्रथम प्रयास का साहस जुटा सके हैं। बाद में एक अधिकारी ने बताया भी कि इस इलाके में दलित समाज मंदिर प्रवेश की बात सोच भी नहीं सकता। 
फिर भी दलित समाज मंदिर में आना चाहता है। सवाल जेहन में उठा कि आखिर वे कौन लोग हैं जो मंदिर प्रवेश अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं ? वे गाँव के ही हैं, बताया गया। रवीन्द्र सेठी और राज किशोर मुदिली, कुछ और लोग भी हैं। वे कहाँ मिलेंगे, किसी को पता नहीं था शायद उन्होंने बताना नहीं चाहा। वे हरिजन बस्ती में होंगे। वहाँ कोई जाता वाता नहीं है। पुजारी से पूँछा कि दलित समाज के लोग अब आते हैं ? बस कभी कोई आ गया तो बाहर से ही प्रणाम कर चला जाता है। इस सफलता पर कुछ विजयी होने सा भाव भी दिखा। रोक दिये जाने के बाद अब वे प्रवेश की हिम्मत नहीं करेंगे। अब आगे इस सिलसिले में कुछ कहना सुनना बेमानी, बिना मतलब की बात थी। हम लोग जैसे अलग-अलग समय काल के लोग थे। उनके विरूद्ध क्रोध की भी गुंजाइश नहीं थी। हमारे बीच में जैसे कि एक पहाड़ सा खड़ा हो गया था। अब चलने का वक्त था। अगर अभी नहीं चले तो बाकी जिंदगी महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास के समान यहीं रहना भी पड़ सकता है। केरड़ागढ़ का एहसान है मुझपर। यहां पहुँचकर समझ में आया कि कोई पेरियार, कोई ज्योतिबा फुले क्यों बनता है कोई अम्बेडकर क्यों बनता है ? काम सिर्फ एक मंदिर का नहीं है, बल्कि काम तो पूरी मानसिकता के बदलने का है जिसके लिये पीढि़याँ दरकार हैं। 
चलते-चलते आखिरी सवाल कि अगर ऐसे ही रहा तो क्यों ये हिंदू कहे जायेंगे। अगर धर्म में स्वीकार न किया जायेगा तो धर्म परिवर्तन कर ईसाई अथवा मुसलमान हो जायेंगे। एक ग्रामवासी ने बताया कि जब लोग यह मामला राजा साहब, राज परिवार के वर्तमान वंशज, जो मंदिर के प्रमुख ट्रस्टी भी हैं, के पास ले गये तो उन्होंने कहा भी कि हमारे लिये क्यों समस्या पैदा करते हो। जब कहीं प्रवेश नहीं है तो यहीं केरड़ागढ़ में ही क्यों ? उन्होंने आगे कहा कि चाहे तुम ईसाई हो जाओ, मुसलमान हो जाओ, हमसे कोई मतलब नहीं। लेकिन यहाँ इस मंदिर में मत आओ। अगर तुम लोगों में हिम्मत हो तो एक बस ले लो। किराया मैं दे दूँगा। बस के सामने बैनर लगाओ कि तुम केरडागढ़ दलित विकास मंच के लोग हो और पुरी जगन्नाथ जी के दर्शन करने जा रहे हो। यह घोषणा कर के अगर पुरी जगन्नाथ जी में जाकर दर्शन करने में सफल हो जाते हो तो यहाँ भी आ जाओ हमें कोई परेशानी नहीं है। लेकिन सबसे पहले यहीं पर क्यों ? 
आज के लगभग 78 वर्ष पूर्व इसी अप्रैल के महीने में नासिक के कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन का नेतृत्व बाबा साहब ने किया था। मंदिरों में व्यक्ति के प्रवेश और समाज के प्रवेश में बड़ा फर्क होता है। उस समय तक अम्बेडकर को उदारवादी सहिष्णु हिन्दुओं पर भरोसा था। 02 अप्रैल 1930 को मंदिर प्रवेश आंदोलन के दौरान उन्होंने कहा, ‘‘मैं भगवद्गीता के अलावा किसी भी पुस्तक को आदरणीय या प्रमाणिक नहीं मानता, परन्तु मैं अपने को सनातनी हिन्दू मानता हूँ।‘‘ लेकिन सवर्णों के रूख ने उनके भरोसे को तोड़ दिया। उन्हीं बाबा साहब ने सवर्णों की निष्ठुरता से पीडि़त होकर 1935 में येवला जनसभा में कहा कि मैं हिन्दू नहीं मरूंगा। आज 78 वर्षों बाद इतिहास की सीढि़यों पर वहीं के वही खड़े रह गये सनातन हिन्दू समाज को अभिशाप से मुक्ति का एक और अवसर मिला है। राज किशोर मुदिली कोई नेता नहीं है, फिर भी अपने समाज के लिये उसने वह करने का साहस किया है, जो कभी बाबा साहब ने किया था। बाबा साहब के सहारे से खड़े होने के उनके प्रयास में उसके समाज को सहयोग और शक्ति की जरूरत है। 
किसी हिंदू लड़की का मुस्लिम लड़के से विवाह होने पर वह एक ही दिन में धर्म ग्रहण कर मुस्लिम समुदाय की सदस्या हो जाती है। किसी मुस्लिम धर्मगुरू को आपत्ति करते नहीं देखा गया। पिछले चार सौ वर्षों में ईसाई मिशनरियों के प्रभाव से बड़ी संख्या में धर्म परिवर्तन हुआ है। जबकि हमारा धर्म अपने ही भाईयों को शूद्र फिर दलित बनाता है। वापसी का रास्ता बन्द कर धर्म से बहिष्कृत कर देता है। हमारी धर्म परंपरायें हिंदुओं का हिंदू बना रहना रोक दे रहीं हैं। इस्लाम और ईसाइयत के बरक्स हमारे आत्महन्ता धर्म का जवाब केरडागढ़ है, जहां हिन्दुओं के साथ-साथ आजादी, लोकतंत्र मानवता आदि आदि की भी औकात दिखती है। हमारे देवता अपने बड़े बड़े नेत्रों से न जाने कितने वर्षों से इन दृष्यों के साक्षी रहे हैं। 
आगे और कहने सुनने को कुछ बचा भी नहीं था। वापसी में गाँव से बाहर आने से पहले दलित बस्ती जैसे लग रहे एक मजरे में रूक कर पता करना चाहा लेकिन रवीन्द्र सेठी और राज किशोर मुदिली के बारे में कि वे कहाॅ है, कोई बता नहीं पाया। कुछ लोगों ने सड़क से दूर दलित समाज की बस्तियों की ओर इशारा किया। उनसे सम्पर्क का कोई रास्ता नहीं निकल सका। उसी बस्ती के एक बच्चे को एक चिट पर टेलीफोन नम्बर लिखकर इशारों से समझाने की कोशिश की, कि उन दोनों में से अगर कोई मिले तो उसे दे देना। फिर भरे मन से हम लोग वापसी की राह पर चल पड़े। बंधे की सड़क के बाद केन्द्रपाड़ा से कटक शानदार राष्ट्रीय राजमार्ग पर वापस आने के बाद सड़क के दोनों ओर निर्मित हो रहे कालेज, बाजार, उद्योग और विकास के सारे तामझाम खोखले नजर आ रहे थे। उड़ीसा विकास के नारों में अब कोई दम नहीं था। हमारे लिये एक प्रगतिशील उड़ीसा का स्वप्न ध्वस्त हो चुका था। 
स्थानीय ग्राम वासियों ने बताया था कि राजा साहब वहीं भुवनेश्वर में ही रहते हैं। राजा साहब से मिलने हम लोग उनके आवास ‘‘कनिका हाउस‘‘ पहुँचे। कनिका पुरानी बड़ी जमींदारी रही है और उड़ीसा के इतिहास में मयूरभंज के भंजदेवों का सम्मानित स्थान रहा है। राजा साहब केरडागढ़ के अलावा इस जैसे 51 और भी मंदिरों के हेरिटेज ट्रस्ट और प्रबंधक ट्रस्टी हैं। कनिका हाउस का कर्मचारी हमें कई कमरों से होते हुये अन्दर राजा साहब के बेडरूम में लिये गया। राजा साहब पलंग पर बैठे सामने मेज पर रखे बहुत से जरूरी कागजातों, डायरियों वगैरह के बीच कोई पुस्तक उलट-पुलट रहे थे। अवस्था लगभग 75 वर्ष स्वस्थ एवं भव्य शरीर, आश्चर्य से कहा से कि आप लखनऊ से आकर कहां वहां केरडागढ़ तक चले गये ! ऐसा क्या था ? मैने बताया कि अखबारों में पढ़ा कि ऐसा कोई मामला हुआ था। भुवनेश्वर आया तो सोंचा कि वहां भी चले चलें। 
बात शुरू हुई। उन्होंने कहा कि हमारे पास कोई रास्ता नहीं था। ये दलित लोग जबरदस्ती करना चाह रहे हैं। जब कभी प्रवेश नहीं हुआ तो आज ही क्यों ? लेकिन मंदिर तो सबके लिये बराबर होना चाहिये। गीता में भी कृष्ण भगवान ने जब चार वर्णों की बात कही तो वर्णों को हम कैसे समाप्त कर देंगे। साथ ही यह भी कहा कि लेकिन गीता ने किसी का मंदिर प्रवेश नहीं रोका है। मैने कहा कि फिर प्रवेश पर रोक क्यों ? मंदिर उनके लिये है जो हिंदू धर्म का पालन करते हैं। ये लोग कहां धर्म का पालन कर रहे हैं ? लेकिन धर्म के पालन के लिये ही तो मंदिर प्रवेश चाहते हैं ? परंपरा नहीं है उनका जवाब था। हमारे पुजारी वर्ग ने भी कहा कि अगर ये प्रवेश करेंगे तो पूजा अर्चना बन्द कर दी जायेगी। मैं 51 मंदिरों का ट्रस्टी हूँ अगर सारे मंदिरों में पूजा अर्चना बन्द हो गयी ताला लग गया तो क्या स्थिति होगी ? यह एक व्यवहारिक बात थी जिसके मुताबिक समस्या के समाधान की चाबी उड़ीसा के ब्राह्मण समुदाय के हाथ में है। राजा साहब ने भी ग्राम वासियों द्वारा बताई वही बात कही कि अगर पुरी जगन्नाथ मंदिर में अपने समाज के सहित घोषणा करके दर्शन के लिये प्रवेश पा जाओ तो फिर मैं भी प्रवेश की अनुमति दे दूँगा। इन बातों से हमें पुरी के जगन्नाथ मंदिर में दलित प्रवेश की स्थिति स्पष्ट हो चुकी थी। दलित, दलित होना छिपाकर प्रवेश करें तो अलग बात है। आगे बताया कि जगन्नाथ जी रथयात्रा ही इसलिये होती है कि जिन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता है वे दर्शन कर सकें। इसी उद्देश्य से जगन्नाथ जी बाहर आते हैं। उड़ीसा का दलित समाज रथयात्रा के रस्से को ही हाथ लगा कर अपने को धन्य मानता है। बात फिर वर्ण व्यवस्था उड़ीसा में क्षत्रिय वर्ण की अनुपस्थिति की ओर चली गयी। 
बहरहाल वार्ता का उद्देश्य पूर्ण हो चुका था। चलते वक्त उन्होंने ओडि़या भाषा में अपने पारिवारिक इतिहास की एक पुस्तक भेंट की। उड़ीसा के मंदिरों, केरडागढ़ आदि के अलावा पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भी दलित प्रवेश अभी भी विवाद का मुद्दा है और दलित समाज के सामान्य प्रवेश की स्थितियां अभी नहीं बन सकी हैं। यह अलग बात है कि विधिक बाध्यताओं के कारण यह बात स्वीकार नहीं की जाती है। पण्डों के द्वारा चलाये जा रहे हमारे धर्म में विवेकपूर्ण धार्मिक नेतृत्व के अभाव के कारण बिखराव को रोक पाना सम्भव नहीं दिख रहा है। वक्रीय ग्रहों के समान इतिहास की प्रायः एक पश्चगामी गति भी होती है। सांस्कृतिक वैभव के बावजूद उड़ीसा का सामाजिक इतिहास पीछे की ओर गतिमान होकर एक अंधेरे का क्षेत्र बनाये बैठा है। मंदिरों की आरती के प्रकाश और नगाड़ों के नाद में, प्रसाद और भभूत के आडंबर में हम स्वार्थी पुजारियों द्वारा बनाये गये अंधकार के द्वीपों को समाप्त करने के बजाय उन्हें बचाये हुये हैं। दुर्भाग्य है कि हमारे मन्दिर जिन्हें जागरण के केन्द्र होना चाहिये वे ही आज अंधकार के द्वीप हैं। 

आर0 विक्रम सिंह
(पूर्व सैन्य अधिकारी)

Sunday, July 20, 2014

विरोध में संभावनाएं


(आज २० जुलाई को दैनिक जागरण में प्रकाशित )

सतह से नीचे हिंदी के राजनीतिक, प्रशासनिक विरोध का लावा अभी भी गर्म है। गत दिनों हिंदी का विरोध गृह विभाग के एक सामान्य से शासनादेश से भड़क गया। अखिल भारतीय परीक्षाओं में हिंदी का झंडा बुलंद होना प्रारंभ ही हुआ था कि सी-सैट जैसी बला आ गई। यह अवधारणा ही गलत है कि सिविल सेवा क्षमता की परीक्षा महज दो घंटों में हो सकती है। अंग्रेजी का वर्चस्व बनाए रखने की यह कोशिश सबके सामने उजागर हो गई है। आज हिंदी माध्यम के लाखों परीक्षार्थी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं। दक्षिण प्रदेशों में हिंदी की स्वीकार्यता बहुत बढ़ी है, हिंदी जरूरी हो चुकी है, आम लोग मानने लगे हैं। लेकिन राजनीति इसे नहीं स्वीकारती। वह अभी भी पेरियार के काल में खड़ी है। अभी कुछ समय पहले हैदराबाद के एक हिंदी संस्थान में जाने का मौका मिला था। जो बात पता चली वह आश्चर्यचकित करने वाली थी। हिंदी के बेसिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने वालों की संख्या दक्षिण के चार राज्यों में पिछले वर्षो की तुलना में लगभग दस गुने तक बढ़ गई है। दक्षिण भारत का युवा हिंदी को लेकर हो रही राजनीति अच्छी तरह समझ रहा है। वह हिंदी जानना-पढ़ना चाहता है। स्वीकार्यता के बावजूद सत्ता में अभी तक हिंदी को भागीदारी नहीं मिली है। हमने दिल्ली के बहुत से बिजनेस सेमिनारों में हिंदी को बड़ी बेचारगी से खड़े देखा है। सुदूर पूवरेत्तर में तो आतंकवादियों द्वारा गाहे-बेगाहे हिंदीभाषियों को कत्ल कर देने की परंपरा चलती है यहां दिल्ली में सी-सैट कत्लेआम का नया शस्त्र है। इन हालात में भी हिंदी पट्टी हिंदी वालों के लिए कभी खड़ी हुई हो, याद नहीं पड़ता। कमजोरियां अपनी हों तो किसी और को क्या दोष दिया जाए। अजब हैं इस भाषा के पैरोकार, जिन्हें हिंदी की सल्तनत बढ़ाने में कोई दिलचस्पी ही नहीं है। हम उन इलाकों की ओर नहीं बढ़े जो हिंदी और भारत के लिए अनजाने से हैं। किसी ने भी नागालैंड, मणिपुर की परवाह नहीं की। कोई भी अरुणाचल में गांवों की कहानी कहने नहीं गया, न ही हिंदी के किसी कथाकार ने केरल, तमिलनाडु की पृष्ठभूमि पर साहित्य-सृजन का प्रयोग ही किया है। हम हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात करते हैं, लेकिन उन इलाकों को अछूता छोड़ देते हैं जिनके दम पर हिंदी असल में राष्ट्रभाषा बन सकती है। कभी धर्म के मठाधीशों ने पर्वतीय, वनवासी समाज को लावारिस छोड़ दिया था, परिणाम यह हुआ कि वह जनजातीय समाज जो कभी अपनी संस्कृतियों के लिए मरने-मारने पर उतारू था, अचानक विदेशी धर्मो को मानने वाला बन गया। यह कितनी आश्चर्यजनक बात है कि हमारे पूवरेत्तर का समाज, असम, मणिपुर की समृद्ध भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के बावजूद सात समंदर पार के विदेशी धर्मो को अपना लेता है। हमने क्षेत्रीय भाषाओं के विपुल साहित्य से हिंदी प्रदेशों को परिचय नहीं कराया। हिंदी वालों में वह जुनून नहीं है। दूसरी ओर अंग्रेजी में सलमान रुश्दी से लेकर अभिताव घोष, अरविंद अडिग तक भारतीय लेखकों की लंबी श्रृंखला चली आ रही है। अंग्रेजी साहित्य में भारतीय पृष्ठभूमि पर रची स्तरीय रचनाओं की बाढ़ आ रही है, हमारे साहित्यकार अपने ही घरों में कैद घुटन व संत्रस की कथाएं लिखते रहे हैं। ऐसा क्यों है कि हमारा हिंदी साहित्यकार तिब्बत, बर्मा, ताईवान, सिंगापुर तो दूर अपने ही देश की सीमाओं तक अपने साहित्य का विस्तार नहीं कर पाया। कोई यथा-स्थिति की मन:स्थिति है जो टूटे नहीं टूटती। गांधी की कहानी कहने के लिए गिरिराज किशोर अफ्रीका तक चले गए। राहुल सांकृत्यायन ने न जाने कहां-कहां के वृत्तांत लिखे, लेकिन इन प्रेरणाओं का प्रभाव हमारे साहित्य की सामान्य धारा पर पड़ ही नहीं सका। हमने अपनी सीमाएं बना ली हैं और अब जैसे हममें राष्ट्रीय भाषा की महत्वाकांक्षा भी नहीं है। पूवरेत्तर पर अनिल यादव का यात्र-वृत्तांत ‘वह भी कोई देश है महराज’ इन सीमाओं के पार हिंदी की संभावनाएं जगाता है। जोखिम के और भी इलाके हैं। हमें हिंदी की कलम से आदिवासी क्षेत्रों से लेकर कश्मीर और नेपाल तक की कहानियां चाहिए। कोई हिंदीवाला श्रीलंकाई तमिलों की प्रताड़ना, अवसाद की भी तो कहानी लिखे। जस्टिस मारकण्डेय काटजू ने सिर्फ सुझाव दिया था कि हिंदी सभी को सीखनी चाहिए। वह लोकतंत्र ही क्या जिसमें इस सरल सी बात का भी विरोध न हो। विरोध हुआ भी, उन्होंने स्पष्ट भी किया कि यदि कोई नहीं चाहता तो वह इस सुझाव को अस्वीकार कर सकता है। गैरहिंदी क्षेत्रों में हिंदी का एक बड़ा पाठक वर्ग बन रहा है जिसे अपने परिवेश से जुड़े हिंदी साहित्य की दरकार होगी। वहां के स्थानीय हिंदी अखबार, पत्रिकाएं इस कमी को पूरा कर सकते हैं। अत: प्रोत्साहन की आवश्यकता है। हिंदी की बात करें और उर्दू का जिक्र न आए तो बात पूरी नहीं होती। हिंदी में उर्दू साहित्य को स्वीकार कर इस दूरी को हम चंद कदमों में ही नाप सकते हैं। जैसे-जैसे उर्दू साहित्य देवनागरी में छपता जा रहा है वैसे-वैसे यह फर्क खत्म होता जा रहा है। हिंदी के लिए जरूरत है एक सुव्यवस्थित भाषा प्रबंधतंत्र की जो संभावनाओं की नई दिशाओं में राहें बना सके।1कोई भी अभियान बिना किसी स्वप्न और जुनून के नहीं चलता। विरोध संभावनाओं के द्वार भी खोलता है। हिंदी के क्षितिज व क्षेत्र का विस्तार ही विरोध का समाधान है। जो आज का इंडोनेशिया है वह कल श्रीविजय साम्राज्य था। भारत के सांस्कृतिक विस्तार के इतिहास एवं सुदूर पूर्व के साहित्य में प्रदर्शित भारतीय संस्कृति के प्राचीन वैभव को हम हिंदी के सामान्य लोग अभी तक नहीं जान सके हैं। रामकथा किन रूपों में वहां कही गई है। हिंदी पूवरेत्तर के साहित्य को मुख्यधारा में ला सकती है। एक स्वप्न है जो हर हिंदी भाषी को देखना चाहिए कि हमारी हिंदी कश्मीर से श्रीलंका और हिंगलाज बलूचिस्तान से अंकोरवाट कंबोडिया तक की कथाएं कह सकें। भारतीय भाषा-संस्कृति ने तो उस प्राचीन काल में सभ्यताओं की सीमाओं का अतिक्रमण किया था। आज के सरल, सुगम संचार संपर्क के जमाने में हिंदी के विस्तार का यह लक्ष्य कोई असंभव तो नहीं है। (लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं)

Wednesday, June 4, 2014

जोड़ने का सही समय

(  4जून ' 14 को दैनिक जागरण में प्रकाशित )



राष्ट्रीय एकीकरण के लक्ष्य को जमीन पर उतारने का क्या रास्ता है? एकीकरण का तात्पर्य होगा क्षेत्रीयताओं से मुक्ति, राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य का विकास। जैसे गंगा स्वच्छता एक राष्ट्रीय लक्ष्य है। इस अभियान का प्रारंभ एक राष्ट्रीय जन आंदोलन की भांति हो सकता था, लेकिन यह सिर्फ नगर विकास के प्रोजेक्टों और फाइलों का विषय हो गया। नक्सलवादी समस्या के समाधान के लिए प्रभावित राज्यों में सामाजिक आर्थिक समानता के लिए विकास एक राष्ट्रीय बहुराज्यीय आंदोलन के रूप में प्रारंभ हुआ होता तो हमारे सामने सार्थक परिणाम होते। ये बड़ी समस्याएं हैं और राष्ट्रीय एकीकरण के मुद्दे भी हैं। हम चाहते हैं कि पूवरेत्तर भारत की बेरोजगारी खत्म करने के लिए एक राष्ट्रीय नीति बने, लेकिन यह नहीं हो पाता। कश्मीर के युवक सारे भारत में कार्य करें। लेकिन कहीं से कोई पहल नहीं होती। हम चाहते हैं कि वाराणसी, जौनपुर से नौकरी के लिए कोलकाता, मुंबई जाने वाले लड़के मराठी या बंगला में यहीं से शिक्षित हो जाएं जिससे स्वीकार्यता की समस्या न हो, लेकिन न तो ऐसी कोई शिक्षा व्यवस्था है और न ही ऐसी कोई योजना ही है। ये अपेक्षाएं किसी एक विभाग के विषय नहीं हैं। इसके लिए विभागीय संकीर्णताओं को दरकिनार कर, क्षेत्रीयता से बाहर आकर नीतिगत पहल की अपेक्षाएं होंगी। आजादी के पिछले 67 वर्षो में हमने देखा है कि क्षेत्रीय शक्तियां, जिनका राष्ट्रीय एकीकरण के विचार से कोई वास्ता नहीं रहा, राज्यों में क्रमश: सशक्त होती गई हैं। इसमें एक बड़ी बाधा सरकारी विभागों में सामंजस्य का अभाव एवं अलग-अलग काम करने की प्रवृत्ति है। इसे अक्सर ‘डिपार्टमेंट्स इन साइलोस’ अर्थात् अलग-अलग गोदामों में स्थित विभाग जैसे मुहावरे से स्पष्ट किया जाता है। विभागीय प्रमुख यदि विभागीय हितों को प्राथमिकता देने लगें तो समग्र विकास किसके खाते में जाएगा? उदाहरणार्थ यदि विकसित हो रहे ग्रामीण क्षेत्रों में नगरीकरण की सुविधाएं देना चाहें, जो समय के साथ आवश्यक है, तो आप पाएंगे कि इस प्रकार की योजनाएं नहीं हैं। हाईवे ग्रामीण क्षेत्रों से निकलते हैं, उन पर बेतहाशा अनियोजित मंडियां, बाजार बनते जा रहे हैं। उन्हें नियंत्रित करने की कोई व्यवस्था नहीं है। जब आप नगरीय क्षेत्रों में उद्यानीकरण, वनीकरण जैसे अभियान चलाना चाहेंगे तो वन विभाग के पास शहरों के लिए ऐसी कोई योजना ही नहीं है। बंधी हुई लीक पर चल रहे विभागों में अक्सर परिवर्तन की सोच नहीं होती। इसी तरह नक्सलवादी समस्या के मद्देनजर हमें ऐसा विभाग चाहिए जो वनवासी क्षेत्रों में सड़क, संपर्क मार्ग निर्माण के कार्य के साथ उन मार्गो के माध्यम से उद्योग, व्यापार, आधुनिक रोजगार संभावनाएं बढ़ाने की भी बात सोचता हो। साथ ही आदिवासी युवकों- युवतियों को शिक्षण प्रशिक्षण देते हुए उन्हें राष्ट्रीय स्तर तक के रोजगार दिला सकने में सक्षम हो। नहीं, ऐसा कोई विभाग नहीं है जो अलग-अलग कंपार्टमेंट में कार्य कर रहे विभागों की नीतियों को प्रभावित कर उनकी दिशा परिवर्तित कर सकता हो। हमें अलग-अलग विभागीय-क्षेत्रीय मानसिकता को तोड़ने वाले समग्रता की सोच के व्यवहारिक अनुपालन के लिए एक राष्ट्रीय एकीकरण विभाग की आवश्यकता है। यह मात्र ‘भारतमाता की जय’ बोलने वाला विभाग न होगा, बल्कि चिंता करेगा कि राजकीय नीतियों, राष्ट्रीय संसाधनों व विकास की शक्तियों का उपयोग किस प्रकार राष्ट्रीय सशक्तीकरण में किया जाए। अर्थात कहां और किन क्षेत्रों में राष्ट्रीय नीतिगत दखल आवश्यक है। राष्ट्रीय एकीकरण की परवाह वैसे ही की जानी है जैसे पुराने दिनों की समुद्री यात्रओं में सरदार और नाविक दिन रात लगते थे कि जहाज की कहीं कोई कील तो नहीं कमजोर है, कोई पटरा तो नहीं खिसक रहा है। इसी प्रकार पूर्व सैनिकों का एक बड़ा तबका इस देश में है। इनकी चिंता का काम मुख्यतया राज्यों के हवाले है। राज्यों की राजनीतिक गहमागहमी में पूर्व सैनिक बिरादरी की आवाज कमजोर हो जाती है। पूर्व सैनिक वैसे भी जिंदाबाद मुर्दाबाद, चक्का जाम वाले लोग नहीं हैं। देखा जाए तो यह देश का सबसे सक्षम व प्रशिक्षित वर्ग है, लेकिन इनकी सेवाओं का समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है व क्षमताएं बेकार जा रही हैं। कारपोरेट जगत ने सैन्य अधिकारी वर्ग का महत्व तो पहचाना है, लेकिन सरकारें इस ‘टैलेंट पूल’ का उपयोग नहीं करतीं। बड़ी संख्या में नान कमीशंड अधिकारी व सैनिकों को भी रोजगार के अवसर नहीं उपलब्ध हो पाए हैं। सेना से अच्छे ड्राइवर, वायरलेस आपरेटर, सुरक्षा सैनिक और कहां होंगे। बिहार सरकार ने कांट्रैक्ट पर पुलिस में पूर्व सैनिकों की सेवाएं ली हैं। उसका अच्छा परिणाम सामने आया है। पैरामिलिटरी बलों में पूर्व सैनिकों को अवसर क्यों नहीं दिया जाता, समझ से परे है। सिविल डिफेंस, होमगार्डस संभावनाओं के क्षेत्र हैं। स्थानीय निकायों के संचालन में पूर्व सैनिकों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। पूर्व सैनिकों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक मंत्रलय की आवश्यकता है, जो पूर्व सैनिकों के साथ-साथ सेवारत सैनिकों की स्थानीय समस्याओं और सैन्य, पैरामिलिटरी सेवाओं के रिक्रूटमेंट संबंधी नीतियों पर भी मार्गदर्शन दे। भिन्न-भिन्न राज्यों की भिन्न-भिन्न नीतियां इस प्रकार एक ग्रिड पर आ जाएंगी। अगला बिंदु राष्ट्रीय हित एवं नीतिगत स्थिरता को लेकर है। इस उद्देश्य से हमारे देश में संस्थागत सहयोग का अभाव है। आर्थिक नीतियों के लिए तो ‘योजना आयोग’ है, लेकिन विदेश, रक्षा, आंतरिक सुरक्षा संबंधी नीतियों का नियमन प्राय: विभागीय स्तर पर ही होता है। अत: इस संबंध में दीर्घकालीन नीति निर्धारण के लिए ‘पॉलिसी प्लानिंग कमीशन’ जैसे किसी उच्चस्तरीय थिंक टैंक की आवश्यकता होगी। नीतिगत निरंतरता को बनाए रखने व उसे दिशा देने के लिए इस प्रकार का नीति नियामक आयोग एक आवश्यकता है। कमजोर और निर्भर सरकारों के लिए राष्ट्रीय सशक्तीकरण की सोच भी संभव नहीं है। सरकारें कभी मजबूत आएंगी तो कभी कमजोर। एक ऐसी सशक्त बिरादरी बने जो विपरीत परिस्थितियों में भी राष्ट्रीय हितों को निगाह से ओझल न होने दे। सक्षम सरकार का यह दौर राष्ट्रीय लक्ष्यों की दीर्घकालीन योजना के लिए आदर्श समय है। 


(लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी हैं)

Monday, May 12, 2014

संस्कृति का अधूरा सपना

( ६ मई '१४ को दैनिक जागरण में प्रकशित )
भारत मूलत: राजनीतिक नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक राष्ट्र है। संस्कृति की सरहदें नहीं होती। इसी कारण इस सांस्कृतिक राष्ट्र ने सदियों से जमीन पर अपनी सीमाएं नहीं खींची। सुदूर पूर्व में श्रीविजय, इंडोनेशिया और बौद्ध चीन-जापान इस सांस्कृतिक विस्तार के गवाह हैं, लेकिन गजनवियों और गोरियों के हमलों के बाद संस्कृतियों, धर्मो के टकराव ने राजनीतिक सत्ताओं की भूमिका को सर्वशक्तिशाली बना दिया। कुछ पंथ ऐसे हैं जो तलवारों और सत्ताओं के सहारे बढ़े हैं, लेकिन भारत धर्म (‘हिंदू’ दरअसल विदेशियों द्वारा दिया गया नाम है) हजार वर्षो से अधिक समय से राजाश्रय से दूर सत्ता और शासकों के हमलों, झंझावातों को झेलते हुए भी अडिग रहा है। भारत घायल तो हुआ पर खड़ा रहा। न झुका, न टूटा। भारत धर्म और भारत संस्कृति की शक्ति ने राजनीतिक सत्ताओं, शहंशाहों, लार्डो को उनकी सीमाएं, उनकी औकात भी बताई। लेकिन यह भी सत्य है कि पिछले हजार सालों में धर्म और संस्कृति यहां भीषण दबाव में रही है। यह राष्ट्र राजसत्ताओं के कारण नहीं, बल्कि संस्कृति की आंतरिक शक्ति के कारण सुरक्षित रहा है। विचार उठता है कि देश की धर्म-संस्कृति का एक स्वीकार्य केंद्र जिसे हम सांस्कृतिक राजधानी कह सकें, कौन सा है? राजनीति ने तो अपनी राजधानी दिल्ली न जाने कब से कायम कर रखी है, लेकिन सांस्कृतिक राजधानी? हमारी सांस्कृतिक राजधानी निर्विवाद रूप से शिव की प्रिय नगरी काशी, वाराणसी है। काशी धर्म संस्कृति का अजस्न स्त्रोत है। मध्यकाल में काशी ने एक बड़ी कीमत भी अदा की है। इस सांस्कृतिक नगर की सीमाएं इतनी विस्तीर्ण हो कि देश के प्रत्येक राज्य के लिए यहां पर्याप्त भूमि उपलब्ध हो सके। एक सांस्कृतिक राष्ट्र के लिए जरूरी है कि वह काशी को भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में मान्यता दे। देश जोड़ने के लिए सांस्कृतिक मंच राजनीति से कहीं अधिक प्रभावशाली सिद्ध होगा। धर्म बनाम सेक्युलरिज्म की बहस अभी भी कायम है। अगर एक विभाजन के बाद भी भारत अनायास दो राष्ट्रों की मानसिकता से ग्रसित होने का आभास देता है तो इसके कारण राजनीतिक हैं। जिन्ना ने कहा था कि हिंदू और मुसलमान दो राष्ट्र हैं और वे साथ नहीं रह सकते। यही तर्क जिन्ना के पाकिस्तान और भारत विभाजन का आधार बना। हमने मान लिया था कि वह मुसलमान जो जिन्ना के देश नहीं गया वह जिन्ना केदो राष्ट्रवाद को खारिज करता है। उम्मीद हुई कि सांप्रदायिकता के घर बांट लेने के बाद इस देश में नफरत का जहरीला माहौल खत्म हो जाएगा। एक विभाजन के बाद भी सांप्रदायिकता की जड़ें खत्म न होने की वजह क्या हो सकती है ? बहुत पहले इस देश पर सिकंदर का हमला हुआ था। लेकिन सिकंदर की तलवार के घाव बहुत पहले भर गए। हमला मुहम्मद गोरी, महमूद गजनवी का भी हुआ था। लेकिन उन हमलों के बरछे आज भी हमारे सीनों में धंसे हुए हैं। हमलावर तो दोनों थे तो फिर फर्क क्यों है? सिकंदर तो वापस चला गया लेकिन उसके सैनिक, सेनापति और उनकेसाथ आया यूनानी जनसमुदाय वक्त के साथ भारत की संस्कृति समाज में घुल-मिल गए। उन्होंने हमें यूनानी देवताओं थोर, ड्यूस का पुजारी बनाने का प्रयास नहीं किया। लेकिन गोरियों, गजनियों और तुगलकों ने हमारी संस्कृति से जुड़ना, हमारा भाग बनना गवारा नहीं किया, बल्कि तलवार के दम पर हमारे ही समाज को खंडित कर एक समानांतर समाज खड़ा करना प्रारंभ किया। इससे पहले आम समाज में सत्ता का इस हद तक दखल देखा नहीं गया था। देखा जाए तो सनातनधर्मी समाज से ही बौद्ध पंथ का प्रादुर्भाव हुआ था, लेकिन हिंदू, बौद्धों में जो भी विवाद मतांतर रहे वे किसी सामाजिक अलगाव के कारण नहीं बने। लेकिन हजार साल के सहअस्तित्व के बाद भी जिन्ना की राजनीति ने कहा कि हिंदू-मुसलमान दोनों साथ कैसे रह सकते हैं। जिन्ना की सोच ने अलगाव के कारण खोज लिए। यह कैसे होता है कि धर्म परिवर्तित समाज अपनी संस्कृति की स्मृति को पूरी तरह भूल जाए। कैसे अपनी ही संस्कृति, परंपराएं, भाषाएं उनके लिए शत्रुवत हो जाती हैं? बौद्ध बनने के बाद नवबौद्ध सनातनधर्मी समाज के शत्रु तो नहीं बने। गैर-मुल्की सोच के जिंदा रहते हम एक राष्ट्र की कल्पना कैसे कर सकेंगे? जो अपने को आक्रमणकारियों के साथ बतौर शासक आया हुआ मानते हैं उनके मनोभावों को समझा जा सकता है। कम्युनिज्म के प्रादुर्भाव ने आधुनिक समाज पर युगांतरकारी प्रभाव डाला। एक नए धर्म के समान देखते ही देखते आधुनिक विश्व का अच्छा खासा भाग कम्युनिज्म के प्रभाव में आ गया। यह अलग बात है कि सर्वहारा की पक्षधर यह व्यवस्था तानाशाही मनोवृत्तियों का शिकार हो गई। लेकिन धर्म, संस्कृतियों और राष्ट्रीय पहचान की विरोधी इस नई राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था का कभी अंत भी होता दिखेगा, तब सोचा भी नहीं जा सकता था। आज कम्युनिज्म इतिहास की किताबों में है। कारण? यह व्यवस्था मानव समाज पर बलपूर्वक थोपी गई व्यवस्था थी। यही भविष्य उन पंथों का भी है जो लोभ, लालच, सत्ता एवं तलवारों के सहारे फैलाए गए थे। पंथ, मजहब कोई भी हो, वह अपने मूल आधार, अपने राष्ट्र के विरुद्ध खड़ा तो न दिखाई दे। भारत संस्कृति को इसका जवाब खोजना है और इसके रास्ते बनाने हैं। धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारी संस्कृति, भाषा एक होनी चाहिए। पुरातन संस्कृतियों को तोड़ने का प्रयास समाज और राष्ट्र के विरुद्ध जाता है। संस्कृतियां साझा नहीं होतीं, वे एक होती हैं। समग्र राष्ट्र को साथ लाने के लिए सांस्कृतिक एकता की पुनस्र्थापना आवश्यक है। इसी सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए जरूरत है एक अदद सांस्कृतिक राजधानी की ! 
चुनाव का समय है। देश ने तुमसे बड़ी उम्मीदें लगा रखी हैं। काशी अपने भक्तों, प्रतिनिधियों की परीक्षा लेती रही है एवं उनके अहंकार भी तोड़ती रही है। विश्वास न हो तो परंपराओं से प्रस्थान करने वाले काशी के प्रतिनिधि बुद्ध, तुलसी, कबीर से पूछ लिया जाए कि उन पर क्या बीती थी। काशी की मार के भय से काशी से पलायित मत हो जाना साथी! अगर संवैधानिक प्रावधान भी करने हों तो भी काशी को भारत की सांस्कृतिक राजधानी घोषित करने से गुरेज मत करना। फिर उसके बाद सफलताओं का आकाश तुम्हारे लिए है।